शनिवार, 6 जून 2015

"बहुत कठिन है डगर पनघट की"

डगर पनघट के लिए चित्र परिणामआजादी के बाद से हमारे देश में  बहुत प्रगति हुई है । आजाद होने के बाद लगभग  दस सालों तक तो हम अनाज और कपडे के लिए तरसते रहे । आज हम काफी आगे निकल चुके हैं । हमें गर्व है की अब हम अनाज के लिए नहीं तरसते हैं बल्कि सड़क, बिजली और पानी के लिए तरसते हैं । कुछ विशेष वर्ग के लोग सरकारी कॉलेज में  एडमिशन के लिए तरसते हैं और सरकारी नौकरी के लिए तरसते हैं । कोई भी सफर तय करना आसान नहीं है क्योंकि हमारे सिर  पर जिम्मेदारी का घड़ा लाद  दिया गया है । हम डरते हैं कि  कहीं पानी छलक न जाए । ऊपर से कुछ लोग गुलेल लेकर बैठे रहते हैं जो मौक़ा मिलते ही किसी का भी घड़ा फोड़ सकते हैं । अब समझ में नहीं आता है की घड़ा बचाया जाए या इस ऊबड़-खाबड़  सड़क पर अपने पैरों को घायल होने से बचाया जाए ।
 एक साधारण व्यक्ति के लिए सफर करना बिलकुल आसान नहीं है । आजकल रिजर्वेशन के लिए बहुत मारामारी चल रही है । मैं स्पष्ट रूप से ट्रेन  के रिजर्वेशन की बात कर रहा हूँ  क्योंकि बाकी किसी रिजर्वेशन की बात करके मैं विवादों में नहीं घिरना चाहता हूँ । हालांकि उस वाले रिज़र्वेशन का भी सम्बन्ध ट्रेन से है । अगर ट्रेन की पटरियों पर धरना दिया जाए और कुछ दिनों के लिए ट्रेन का आवागमन बाधित कर दिया जाए तो रिज़र्वेशन मिलने की सम्भावनाये बढ़ जाती हैं । रिजर्वेशन और सीट दोनों एक  दूसरे  की पूरक है । अगर आपको रिज़र्वेशन मिल  गया तो सीट मिल ही जाएगी । अब बेचारे वो लोग क्या करें जिन्हे भगवान ने वेटिंग में पैदा कर दिया । वो अगर कभी किसी से कहते भी हैं कि  हमारी हालत बहुत खराब है  कृपया अपनी सीट पे थोड़ी जगह हमें भी दे दीजिये, तो उन्हें तुरंत जवाब मिल जाता है " आपके पूर्वजों ने खूब सीट के मजे लिए हैं ।" अब ये कहाँ की समझदारी है कि जिसके बाप दादा ने सीट पे सफर किया हो, उन्हें सीट ही न दी जाए । ये वेटिंग वाले लोग अपनी जान को हथेली पर लेकर गेट पर लटककर सफर करने को मजबूर हैं । अंदर घुसने के चांस बहुत कम होते हैं । बोगी के अंदर तभी घुसा जा सकता है जब कोई जान पहचान का पहले ही अंदर घुस चुका हो । अगर किसी का लिंक किसी मंत्री से हो तो स्पेशल कोटे से वह भी आराम से सीट पे सफर कर सकता है । मुसीबत तो हम जैसे सीधे सादे लोगों के लिए है जिनका न कोई लिंक है और न रिज़र्वेशन ही मिल रहा है । हमें तो तत्काल में भी सीट नहीं मिल रही है । बस भगवान का ही भरोसा है । अगर सौभाग्य से सीट मिल गयी तब तो ठीक है वरना किसी बस में सवार होना पडेगा । ऐसे समय  में ये गाना बहुत अच्छा लगता है" बहुत कठिन है डगर पनघट की।"

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